छत्तीसगढ़ है उसका नाम
जहाँ जाने का मन करता है
है एक गलत धारणा लोगो के मन में
उसे बदलने का मन करता है
है आज भी यहाँ के खेतो की मेंढे ऊँची - बड़ी
जिसे देख लोग समझते है की
ये लोग है जंगल के
अलग थलग से ,
किसी ने न पूछा नाक में तीन - तीन नथ पहने पड़ोसन से
कि वजह क्या है
वजह तो सिर्फ इतनी सी कि पानी को बचाकर चावल ज्यादा पैदा करना है,
आज न जाने क्यूँ यहाँ एक अपनापन सा लगता है ,
शायद बचपन के दिन याद आने लगते है,
छतीसगढ़ पहुच कर बचपन के दिन और ज्यादा याद आने लगते है,
ऊँचे नीचे टीलो पर परत दर परत ये खेतों की मेंढे,
मन में एक नया रोमांच भरती है,
इसकी वजह बचपन के ही वो दिन थे,
हर दरख़्त हर खेत देखने का मन करता है,
कई साल बाद आज भी ये दरख़्त वैसे ही है,
जैसे इन्हें छोड़ गया था,
बड़े निराले थे वो दिन जब ट्रेन में भाइयो से लड़कर,
खिड़की की सीट बैठकर बाहर के नज़ारे लेता था,
लेकिन जिंदगी की भीड़ में आज न जाने वो खुशी कहाँ छूट गई है,
ऐसे लगता है की सारी खुशियों के स्टेशन को जिंदगी की गाडी ने पीछे छोड़ दिया है,
जो अब सब कुछ बेगाना लगता है,
बस जिए जा रहे है,
अतीत के पन्ने आँखों के सामने से रुखसत होते है,
और ऐसा लगता है की मैं अभी भी एक मासूम बच्चा हूँ,
जिसकी मासूमियत वक़्त ने आज अपने पहलु में समेट ली है,
आज अपने अतीत से गुजरकर अच्छा लग रहा है,
मानो वक़्त थम सा गया है,
हर स्टेशन पर बैठा हर शक्श जाना पहचाना सा लगता है,
शायद ये सब मन में छुपे वे पहलु है जिनका एहसास मुझे भी आज ही हुआ है,
ये मन में छुपे वोह दर्द है जो लोगो के चेहरे में दिखने लगा है,
याद आते है नक्सली संघर्ष के वो दिन,
जब सारी मीडिया के साथ देश के हर शक्श ने इन्हें देशद्रोही कह दिया था,
शायद तब की पीड़ा अब निकल रही है,
जब इन मासूमो के बीच रह कर सारा बचपन याद आ गया,
मेरे बचपन के ३ साल ये मानने को आज भी तैयार नहीं होते है कि
कैसे इन लोगों ने इतने जघन्य अपराध कर दिए,
बहुत देर तक सोचने के बाद समझ आया कि इन सबका कारण
दिल्ली से इनकी दूरी ही है.
Sunday, February 20, 2011
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