10 अगस्त रात 10.30 बजे एक गोली की आवाज और एक मोटरसाइकिल के गिरने से रात का सन्नाटा टूट जाता है। मामला जम्मू-कश्मीर को कुपवाड़ा जिले के चक-कीज़म गांव का है। जब ग़ुलाम अहमद मग्रे को सेना के जवानो ने गोली मार दी। गांव के ही बशीर अहमद का कहना है कि जैसे ही वह घर के गेट पर पहुंचा सेना के एक जवान ने उसे गोली मार दी। स्थानीय निवासी उसे जिला अस्पताल ले गये जहां डाक्टरो ने उसे श्रीनगर के लिये रिफ़र कर दिया। सेना द्वारा की गई इस करतूत के बाद लोगो ने जमकर नारेबाजी कर विरोध किया। ले.कर्नल जे.एस. बरार ने बताया कि उन्हे इस मामले की कोई जानकारी नही है जबकि एस.एस.पी कुपवाड़ा उत्तम चन्द ने बताया कि वह सही सलामत है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि आखिर सेना बिना जांच पड़ताल के किसी को भी कैसे गोली मार सकती है।
सेना के लिये इस तरह की घटना कोई नई बात नही है। इससे पहले भी सेना ने अनेको ऐसे काम अन्जाम दिये है जिन पर जानवरो को भी शर्म आ जाए।
पहला काण्ड
13 जनवरी 1997 को सेना ने असम के नगाऊं जिले के राजबरी गांव में छापा मारा। छापे के दौरान ग्रामीण दशरथ सिंह को एक जवान ने गोली मार दी। गोली दशरथ सिंह के सिर को फाड़ते हुए निकल गई। आवाज़ सुनकर कमाण्डिंग ऑफीसर चिल्लाया- राजू तब जवान ने कहा कि गलती हो गई साब और मामला खत्म।
दूसरा काण्ड
25 जुलाई 1997 को 25वी पंजाब रेजिमेन्ट के जवानो ने आसाम के सोनित- पुर जिले के कुमुचुबारी गांव में दबिश डाली। सभी गांव वालो को एक जगह इकठ्ठा होने के आदेश दिये गये। इसी समय मौके का फायदा उठाते हुए दो जवान उमेश कोच के घर में घुस गये और उसकी पत्नी से जबरदस्ती करने लगे। उमेश की पत्नी किसी तरह जान बचाकर भागने में क़ामयाब हो गई। वासना के भूखे भारतीय सेना के दोनो जवानो ने उसकी 12 साल की मासूम बच्ची ममोनी से बारी-बारी बलात्कार किया और बाद में 10 रूपये का नोट उसपर फेंककर भाग गये।
तीसरा काण्ड
30 मई 1997 को सेना ने मानवाधिकार कर्मी छेनीराम को उठाया और 1 जून को उसकी बिना सिर की लाश को स्थानीय पुलिस को सौंप दिया और बताया कि 31 मई को हुई मुठभेड़ में वह मारा गया जबकि हक़ीकत में ऐसी कोई मुठभेड़ हुई ही नही।
ऊपर लिखी कुछ घटनाएं महज एक आईना है सेना की करतूत और उसका असली चेहरा दिखाने के लिए। हाल ही में जम्मू-कश्मीर सरकार ने बताया है कि 1990 से जुलाई 2009 तक राज्य से करीब 3500 युवा गायब है। अनाथों की संख्या लगभग 27000 पहुँच गई है जिसमें 20000 अनाथ ऐसे है जिनके मां-बाप सेना द्वारा की गई कार्यवाही में मारे गये है और प्रदेश में विधवाओ की संख्या 9000 है जिसमें लगभग 6500 के पतियों की मौत सेना द्वारा की गई कार्यवाही में हुई है। हालांकि सेना ने अनेक मामलो में कार्यवाही की है लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी घटनाएं होती ही क्यूँ हैं। ऐसी घटनाओं से सेना की विश्वसनीयता ख़तरे में पड़ गई है। सेना को अपनी विश्वसनीयता बचाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने ही पड़ेंगे।
संदीप वर्मा
रेडियो एवम् टेलीविज़न पत्रकारिता
Thursday, September 17, 2009
Saturday, September 5, 2009
देव आनंद
86 साल के हो चुके देवानंद को कल शाम को नई दिल्ली के सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में देखा। उनके अंदाजेबयां को देखकर ऐसा लगा की मैं उनकी कोई फ़िल्म देख रहा हूँ। बन्दे के अंदर आज भी कुछ करने का जोश है। और इसीलिय वोह अभी तक जिन्दा है नही तो अनेक लोग इस उम्र मैं आते आते या तो बिस्टर पकड़ लेते है या फिर दम तोड़ देते है। इसलिए मैं तो उन बुजुर्गो को देव साहब की मिसाल देता हूँ ।
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